कोविड-19 हमें जीवन की क्षण-भंगुरता की शाश्वत सत्यता से एक बार फिर से याद दिलाने का माध्यम वन गया है।माना जा सकता है कि हम भौतिक प्रगति के सोपानों को अपने स्केल पर किसी भी स्तर तक पहुच लें पर चीन के उदाहरण ने सिद्ध किया कि कम्यूनिज्म और डिक्टेटरशिप भी वस मुखौटे हैं जब कि प्रकृति इन मुखौटों के अंदर झांकती कुरूपता को दो पल में उजागर कर देती है।हम जीवन की उस शैली में हैं कि जिसमें भय,अकेलापन,निष्क्रियता,मृत्यु,एकरसता की ऊव,असहाय-स्थिति,इत्यादि जीवन के संपूर्ण आयाम संकुचित और पंगु से हो गये हैं।यह हमें कितनी चुनौती पूर्ण लगता है कि सारी चुनौतियां भी मूर्छित हैं।फिर भी -मोदी है तो मुमकिन.........।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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