कोविड-19 हमें जीवन की क्षण-भंगुरता की शाश्वत सत्यता से एक बार फिर से याद दिलाने का माध्यम वन गया है।माना जा सकता है कि हम भौतिक प्रगति के सोपानों को अपने स्केल पर किसी भी स्तर तक पहुच लें पर चीन के उदाहरण ने सिद्ध किया कि कम्यूनिज्म और डिक्टेटरशिप भी वस मुखौटे हैं जब कि प्रकृति इन मुखौटों के अंदर झांकती कुरूपता को दो पल में उजागर कर देती है।हम जीवन की उस शैली में हैं कि जिसमें भय,अकेलापन,निष्क्रियता,मृत्यु,एकरसता की ऊव,असहाय-स्थिति,इत्यादि जीवन के संपूर्ण आयाम संकुचित और पंगु से हो गये हैं।यह हमें कितनी चुनौती पूर्ण लगता है कि सारी चुनौतियां भी मूर्छित हैं।फिर भी -मोदी है तो मुमकिन.........।
बिहार-तुम्हें क्या हो गया है।क्या तुम चन्द्रगुप्त मौर्य बाले ही हो.....उज्जैनी-अवन्तिका ने अपने को फिर भी चन्द्रगुप्त विकृमादित्य और कालिदास के अनुरूप कुछ वचा लिया पर बिहार तुम.......एक सजायाफ्ता भ्रष्टाचारी के नवीं फेल बेटे को.......थू।तुमने कुछ नहीं सोंचा,पर तुमने चलो कुछ शर्म की और उनको फिर लाये जो तुम्हे खुशहाली में लाने की कुछ तो कोशिशें करें गें।तुम्हारा वहुत उपकार।मेरा कुछ भी रिस्क पर नहीं फिर भी कल पूरे दिन पता नहीं क्यों मेरा मत्था गरम रहा।
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