चीन ने 1962 में भारत को नहीं हराया था।भारत को तत्कालीन रक्षामंत्री ,कम्यूनिष्ट कृष्न मेनन ने तथा राइफल 3.3 ने हराया था।फिर भी चीन भारतीय सेना के जीबट से इतने आक्रान्त थे कि बाद तक कई प्रकार से चीनियों ने इसे स्वीकार किया।॓दस दस को एक ने मारा ॔मात्र गीत की पंक्ति नहीं है,यह वास्तविकता थी।जहां तक 3.3 की बात ,तो जब चीनी स्वचालित एके47 से लड़ रहे थे ,हम प्रथम विश्व-युद्ध की 3.3 से।यह भारतीय आयुध-निर्माणी संगठन की बड़ी लापरबाही थी।
अव चीन की विस्तारबादी हरामपंथी को पहली बार धक्का लगा है।विश्वास किया जा सकता है कि वर्तमान परिस्थितियों में चीन किसी मिसएडवेंचर से अपनी महान प्रगति को वड़े खतरे में डाल कर आत्महत्या की तरफ नहींवढ़े गा।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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