हम अपने अनुभवों की गठरी ,वहुत बार जैसी की तैसी किसी अपने जूनियर,पुत्र,मित्र,शिष्य या किसी के भी सिर पर रख कर कृतकार्य होने की गलती करते ,अनायास देखे जा सकते हैं,जब कि वास्तविकता यह है कि हमारे वे अनुभव ,अधिकांश बीते समय की कुछ स्म्रतियां मात्र हैं जिनका दार्शनिक पक्ष वहुत ,आज के संदर्भ मे पुराना पड़ चुका हो सकता है और जिसमें आज के युवा की वहुत सीमित या शून्य रुचि हो सकती है।आयु-सम्पन्न लोग ,इसीलिये अगली पीढ़ी को,पथ-हीन तक वताने की नादानी तक पहुंचते देखे जा सकते हैं ,हमें यह देखना होगा कि आनेवाला कल बीते कल से सदैव अधिक सुंदर होगा।हां ,मै यह बात, कोरोना के इस कठिन समय सामने ,अपने कुरूपतम भंगिमा में ,होने की सच्चाई के वाबज़ूद कहता हूं।
बिहार-तुम्हें क्या हो गया है।क्या तुम चन्द्रगुप्त मौर्य बाले ही हो.....उज्जैनी-अवन्तिका ने अपने को फिर भी चन्द्रगुप्त विकृमादित्य और कालिदास के अनुरूप कुछ वचा लिया पर बिहार तुम.......एक सजायाफ्ता भ्रष्टाचारी के नवीं फेल बेटे को.......थू।तुमने कुछ नहीं सोंचा,पर तुमने चलो कुछ शर्म की और उनको फिर लाये जो तुम्हे खुशहाली में लाने की कुछ तो कोशिशें करें गें।तुम्हारा वहुत उपकार।मेरा कुछ भी रिस्क पर नहीं फिर भी कल पूरे दिन पता नहीं क्यों मेरा मत्था गरम रहा।
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