हम अपने अनुभवों की गठरी ,वहुत बार जैसी की तैसी किसी अपने जूनियर,पुत्र,मित्र,शिष्य या किसी के भी सिर पर रख कर कृतकार्य होने की गलती करते ,अनायास देखे जा सकते हैं,जब कि वास्तविकता यह है कि हमारे वे अनुभव ,अधिकांश बीते समय की कुछ स्म्रतियां मात्र हैं जिनका दार्शनिक पक्ष वहुत ,आज के संदर्भ मे पुराना पड़ चुका हो सकता है और जिसमें आज के युवा की वहुत सीमित या शून्य रुचि हो सकती है।आयु-सम्पन्न लोग ,इसीलिये अगली पीढ़ी को,पथ-हीन तक वताने की नादानी तक पहुंचते देखे जा सकते हैं ,हमें यह देखना होगा कि आनेवाला कल बीते कल से सदैव अधिक सुंदर होगा।हां ,मै यह बात, कोरोना के इस कठिन समय सामने ,अपने कुरूपतम भंगिमा में ,होने की सच्चाई के वाबज़ूद कहता हूं।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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