जीवन वहुत सरल है-कहने वाले ,संभवतः,जीवन को विना ठीक से देखे ,कह दे रहे हैं।हम इतना कम समय व क्षमता लेकर पैदा हुये हैं कि जीवन को समझने की इच्छा पैदा होते होते आधी जिंदगी बीत चुकती है और हम जब जीवन को देखते हैं तो वह करोड़ों करोड़ वर्षों का इतिहास संजोये मिलता है।दर्शन के प्रयत्न नाकाफी लगने लगे हैं,विज्ञान के दावे सिर्फ कुछ प्रथम उत्तरों तक सीमित हैं।अव समय वह है कि दर्शन ,विज्ञान के आगे नहीं ,पीछे है।अव हमें जीवन को समझने के लिये नये दर्शन की जरूरत है,जब कि हम सातवीं शताव्दी को ज्ञान की अंतिम शताव्दी मानने की नादानी में जीवित हैं।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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