जीवन वहुत सरल है-कहने वाले ,संभवतः,जीवन को विना ठीक से देखे ,कह दे रहे हैं।हम इतना कम समय व क्षमता लेकर पैदा हुये हैं कि जीवन को समझने की इच्छा पैदा होते होते आधी जिंदगी बीत चुकती है और हम जब जीवन को देखते हैं तो वह करोड़ों करोड़ वर्षों का इतिहास संजोये मिलता है।दर्शन के प्रयत्न नाकाफी लगने लगे हैं,विज्ञान के दावे सिर्फ कुछ प्रथम उत्तरों तक सीमित हैं।अव समय वह है कि दर्शन ,विज्ञान के आगे नहीं ,पीछे है।अव हमें जीवन को समझने के लिये नये दर्शन की जरूरत है,जब कि हम सातवीं शताव्दी को ज्ञान की अंतिम शताव्दी मानने की नादानी में जीवित हैं।
बिहार-तुम्हें क्या हो गया है।क्या तुम चन्द्रगुप्त मौर्य बाले ही हो.....उज्जैनी-अवन्तिका ने अपने को फिर भी चन्द्रगुप्त विकृमादित्य और कालिदास के अनुरूप कुछ वचा लिया पर बिहार तुम.......एक सजायाफ्ता भ्रष्टाचारी के नवीं फेल बेटे को.......थू।तुमने कुछ नहीं सोंचा,पर तुमने चलो कुछ शर्म की और उनको फिर लाये जो तुम्हे खुशहाली में लाने की कुछ तो कोशिशें करें गें।तुम्हारा वहुत उपकार।मेरा कुछ भी रिस्क पर नहीं फिर भी कल पूरे दिन पता नहीं क्यों मेरा मत्था गरम रहा।
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