सीपिया वरन,मंगलमय तन,
जीवन-दर्शन वांचते नयन...... वरदानों से उजले-उजले, कर्पूरी वांहों के घेरे, इंगुरी हंथेली पर जैसे, लिक्खे हों भाग्यलेख मेरे, कुछ पल ठहरो तो पूजा में बिखरा दूं अंजुरे भरे सुमन। सीपिया वरन,मंगलमय तन.....श्री भारत भूषन।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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