किसी भी प्रविधि जो स्वतंत्रता दिलाने में सहायक होती.....की तलाश में गांधी ने संपूर्ण देश की यात्रा की।उन्हों ने देखा भीषण गरीबी,दुर्वलता-शारीरिक ही नहीं मानसिक व सांस्कृतिक भी।यहां मानसिक गरीबी का अर्थ है -किसी भी युद्ध जो विदेशी सत्ता से भिड़ने के लिये जरूरी था..की सन्नद्धता के प्रति जागरूकता,उत्सुकता,तैयारी।बह गांधी को कहीं नहीं मिली।1857 की हार ने किसी विजय की संभावना,आमने सामने के आयुध -युद्ध के माध्यम से प्राप्त करने की ,पूरी तरह खत्म कर दी थी।गांधी को यह लगा कि अव सत्याग्रह-आंदोलन जो यहां की डरी,सहमी जनता के लिये अनुकूल थी,ही अंतिम विकल्प है और उन्होंने फिर वही अपनाया।नेता जी सुभाष के आह्वान पर-तुम मुझे खून दो मै तुम्हे.....कितने लोग खून देने हेतु आगे आये.....।यहां के आम आदमीं में वह खून था ही नहीं...।जो खून दे रहे थे वे डकैत कहे गये।
गांधी जी का मूल्यांकन आज ड्राइंगरूम में बैठ कर नहीं किया जा सकता,बिना तत्कालीनता को पूरा समझे।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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