समय का चरित्र मेडिकल डाक्टर्स के प्रति वढ़ती अनास्था की ओर उन्मुख है।कोरोना के संदर्भ में वारियर्स का विचार मोदी जी की शह पाकर किसी सीमा तक डाक्टर्स की छवि संभालने में वहुत सहायक हुआ ,पर जो दुर्घटनायें डाक्टर्स के साथ होना शुरू हो गईं हैं वे शुभ संकेत नहीं हैं।वास्तबिकता है कि चिकित्सा-व्यय इस सीमा तक वढ़ गया है कि मरीज को असहनीय हो जा रहा है....तव उसके तीमारदारों में रोष होना स्वाभाविक है।हमें इस सच्चाई को समझना होगा कि किसी चिकित्सा-सुविधा की कीमत क्या है।हम दो बातें साथ साथ नहीं कह सकते-1.ओहो ,इतने टेस्ट वता देते हैं कि.......2.अरे टेस्ट कराये विना ही दवा शुरू कर दी,और नतीजा......।हम डाक्टर्स के बारे में विभाजित मस्तिष्क से सोंचते हैं, केवल आर्थिक विपन्नता के कारण।डाक्टर्स ठीक से काम कर सकें ,उसके लिये पहली आवश्यकता है निर्भय होना,तो उनकी सुरक्षा पहली आवश्यकता है।आज एक डाक्टर वनाने में पांच से दस करोड़ रुपया खर्च होता है।हम यह सच कैसे भूल सकते हैं।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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