भाई चारा-का संदर्भ निश्चित ही हिंदू और मुसलमान के बीच संवंधो को लेकर ही संभवतः पाकिस्तान वनने के बाद ज्यादा ही रटा जाने बाला और एक कांग्रेसी,कम्यूनिष्ट,कम्यूनल त्रिगुटी नारा है।क्या यह इस बात का संकेत नहीं कि यह भाई चारा अभी नहीं है,अन्यथा नारे की आवश्यकता ही क्या है।अगर होता तो यह निरर्थक होता।तो अगर भाई चारानहीं है तो क्या यह स्वाभाविक प्रश्न नही पैदा होता कि क्यों नहीं है।और क्या इस क्यों नहीं है की पूरी खोज-बीन,निर्णयात्मक बिंदुओं का निर्धारण और फिर उनका ही निराकरण नहीं जरूरी है।क्या इस पर व्यापक शोध नहीं होना चाहिये।क्या किसी में इतनी हिम्मत नहीं।क्या इसके पीछे किसी मजहबी घिनौन के बाहर आ जाने का भय तो नहीं।......सभी प्रश्न उत्तर चाहते हैं,बिना उत्तर खोजे यह भाई चारे के धोखे-धड़ी से कुछ फायदा नहीं होनेवाला।क्या हम इस चूतियाफंदी से बाहर आने का साहस दिखायें गे।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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