हमारी अहिंसा से हम हारे,क्यों कि हम भीषण क्रूर लोगों से लड़ रहे थे।अब हमें उतनी ही
क्रूरता से लड़ना होगा,तैयारी और मानसिकता वनानी होगी,अन्यथा हम फिर हारें गे।संगठित होना अतिरिक्त गारंटी होगी।दार्शनिक स्तर पर बे हारकर भी अपनी हिंसा और क्रूरता से डरायें गे ,जो उनका पुराना तरीका है,उनका शायर कहता है-तुम्हारी हथेली पे जान थोड़ई है.....मतलब तुम कायर हो,हम नहीं।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें