हाथरस,हाथरस......क्या यह राजनीतिक-गिद्धता घिनौन की निक्रष्टतम दुर्गंध बनकर रह जाये गी ।क्या अपराधियों का मजहब,धर्म यह फैसला करे गा कि किस आरोपित को फांसी हो किस की नहीं।क्या यह शर्म से खारिज नेता वनने के भुक्खड़ नवसिखिये चोर, बलरामपुर का रास्ता नहीं जानते।क्या इन्हे राजनीतिक संकीर्णता ने दिमागी लकबाग्रस्त कर दिया है......।सालों ,वलरामपुरमें यही दुर्घटना मुसलमानों ने की है......बह भी देखो......सेकुलरों-तुमने अपनी सांप्रदायिकता की काली सूरत दिखा दी है- राज-कर्मी सियारों।
हम यह फैसला नहीं देते कि दोषी कौन है इन दुष्कर्मोंमें।
बिहार-तुम्हें क्या हो गया है।क्या तुम चन्द्रगुप्त मौर्य बाले ही हो.....उज्जैनी-अवन्तिका ने अपने को फिर भी चन्द्रगुप्त विकृमादित्य और कालिदास के अनुरूप कुछ वचा लिया पर बिहार तुम.......एक सजायाफ्ता भ्रष्टाचारी के नवीं फेल बेटे को.......थू।तुमने कुछ नहीं सोंचा,पर तुमने चलो कुछ शर्म की और उनको फिर लाये जो तुम्हे खुशहाली में लाने की कुछ तो कोशिशें करें गें।तुम्हारा वहुत उपकार।मेरा कुछ भी रिस्क पर नहीं फिर भी कल पूरे दिन पता नहीं क्यों मेरा मत्था गरम रहा।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें