यह किसान जिस धमकी शैली में आंदोलन चला रहे हैं,इन्हे यह खुशफहमी है कि यह नेता जो खुद दोगले और झूंठे हैं,इनको ,अपने आकाओं के लिये कुछ दिलवा पायें गें।यह पूरी तरह निराधार है।कोई भी सरकार किसी भी कीमत पर बिरोधियों का एजेंड़ा सफल नहीं होने देगी,और जब सामान्य जन इस सारी हलचल के खिलाफ हो।
यह स्पष्ट होता जा रहा है कि बीजेपी सरकार के प्रस्तावित हर कानून का बिपक्ष बिरोध कर रहा है,ऐसी स्थिति में सरकार तो और भी इन कानूनों को वापस नहीं लेगी।कुछ राजनीतिक पार्टियों के मुखौटे वदलनें में सहायक होने के अतिरिक्त इस पूरे हंगामें का कोई लाभ नहीं होगा।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
अव सुनाई पड़ रहा है सरकार किसान-आंदोलन को बदनाम कर रही है....।अगर यह सही है तो क्या इसमें जनता की भागीदारी नहीं जिसने भीषण वहुमत से सरकार वनाई है।यह कि सरकार बदनाम कर रही है उन हरामखोरों के द्वारा वनाया गया पर्दा है जिसके पीछे यह लोग चोट्टे धनिक,छद्म कम्यूनल,हारे हताश तिरस्कृत राजनीतिक दल्लों,शाहीनबागीयों,देशद्रोहियों के पापों को छुपाना चाहते हैं।यह सारे अब खुले में आ गये हैं और सारा प्रवुद्ध बर्ग इन्हे चिन्हित कर चुका है।
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