याद आता है,गांव कभी इस कुलक्षण (बलात्कार) से मुक्त थे।शहर किसी सीमा तक योन शुचिता में शिथिलता के उदाहरण ,कभी कभी हुआ करते थे।दंगा या मुस्लिम व्यबहार -जैसे मोपला,कश्मीर,वंगलादेश......या फिर लव जेहाद की कथाओं से इतर कुछ अधिक से गांव परिचित नहीं थे परंतु इस बीच एक व्यवस्था ध्वस्त हो गई-पूरोहित।पुरोहित पूरे गांव में अपने वचनों,व्यवहारों,अनुष्ठानों,शुचितापूर्ण-चरित्र,संपूर्ण समर्पण की आभा में पूरे गांव को वांधता था और किसी भी वच्चे को ,चाहें किसी का-थोड़ी डांट दे सकता था।बह ्यबस्था ध्वस्त ही नहीं हुई वल्कि तिरस्कार के लक्ष्य पर है......तो अव कोई नई व्यवस्था वनी नहीं जो है वह इस कुत्सा को किसी रूप में नियंत्रित नहीं वल्कि वढ़ावा देती है। अव हमारे नेता ही आदर्श है जो कि वहुत घटिया हैं।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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