संपूर्ण हिंदी कविता-साहित्य और किसी सीमा तक भारतीय कविता पढ़ने के बाद यह देखा कि जैसे भारतीय कवि को न तो मध्य काल के दुर्गंध से भरे नबावी अत्याचार से मतलब है और न देश के बंटबारे से उगे खूनी पाकिस्तान और उसके पार्श्व में होता पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों के बंशनाश की जेहादी कोशिश से।यहां तक कि कश्मीर में पूरे दशक में होने वाले हिंदू नर-संहार और भय-पलायन से भी कोई संवेदना भारतीय कवि को नहीं।क्या यह संवेदन शील जमात सिर्फ व्यक्तिगत दुखों पर रोना जानती है,या यह वर्ग इतना कायर है कि इसे सव ड्राइंग-रूम की सुरक्षित दीबारों में ही कविता आ पाती है।हां ,अपबाद है तो एक कविता श्री तरुण विजय जी की जिसमें तत्कालीन नेताओं पर ब्लेड जैसा कटाक्ष है और कत्ल होते कश्मीरी हिंदुओं की वेदना।उन्हे साहसिक प्रणाम।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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