आज उन तुक्ष लोगों की याद आ गई जो कहते थे -यह मंदिर नहीं वनायेंगे ,यह इस वहाने लगातार राजनीति करके श्री राम के वहाने चुनाव बैतरणी पार करते रहने का इंतजाम करते रहें गें।
वास्तव में यह कहने वालों के पैमाने में वह स्केल है ही नहीं जिससे मोदी जी को नापा जा सके।यह वही घटिया लोग हैं जो सिर्फ वहानेबाजी की राजनीति करने के आदी हैं क्योंकि इनकी राजनीति का उद्देश्य ही स्वयं-केन्द्रित है।मुसलमान को भी यह लोग इसलिये पसंद हैं कि वे अपने मजहवी एजेंडे के लिये खुला मैदान पाते हैं अपने वोट -शक्ति के एवज में। भारतीय राजनीति सत्तर साल से इन्हीं तुक्षताओं के चंगुल में फंसी रही और बिभिन्न चुनाव -संकीर्ण बीस,बाइस,दस,बारह सूत्रीय प्रोग्रामों की अल्पकालिक चूतियापे में चक्कर काटती रही।जब कि इस देश को दीर्घकालिक विज़नरी योजनाओं की जरूरत थी।
बिहार-तुम्हें क्या हो गया है।क्या तुम चन्द्रगुप्त मौर्य बाले ही हो.....उज्जैनी-अवन्तिका ने अपने को फिर भी चन्द्रगुप्त विकृमादित्य और कालिदास के अनुरूप कुछ वचा लिया पर बिहार तुम.......एक सजायाफ्ता भ्रष्टाचारी के नवीं फेल बेटे को.......थू।तुमने कुछ नहीं सोंचा,पर तुमने चलो कुछ शर्म की और उनको फिर लाये जो तुम्हे खुशहाली में लाने की कुछ तो कोशिशें करें गें।तुम्हारा वहुत उपकार।मेरा कुछ भी रिस्क पर नहीं फिर भी कल पूरे दिन पता नहीं क्यों मेरा मत्था गरम रहा।
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