आज उन तुक्ष लोगों की याद आ गई जो कहते थे -यह मंदिर नहीं वनायेंगे ,यह इस वहाने लगातार राजनीति करके श्री राम के वहाने चुनाव बैतरणी पार करते रहने का इंतजाम करते रहें गें।
वास्तव में यह कहने वालों के पैमाने में वह स्केल है ही नहीं जिससे मोदी जी को नापा जा सके।यह वही घटिया लोग हैं जो सिर्फ वहानेबाजी की राजनीति करने के आदी हैं क्योंकि इनकी राजनीति का उद्देश्य ही स्वयं-केन्द्रित है।मुसलमान को भी यह लोग इसलिये पसंद हैं कि वे अपने मजहवी एजेंडे के लिये खुला मैदान पाते हैं अपने वोट -शक्ति के एवज में। भारतीय राजनीति सत्तर साल से इन्हीं तुक्षताओं के चंगुल में फंसी रही और बिभिन्न चुनाव -संकीर्ण बीस,बाइस,दस,बारह सूत्रीय प्रोग्रामों की अल्पकालिक चूतियापे में चक्कर काटती रही।जब कि इस देश को दीर्घकालिक विज़नरी योजनाओं की जरूरत थी।
भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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