भारत विभिन्न धर्मों की प्रयोगशाला है,इसका कारण यहां पनपी सर्व-कल्याणकारी सनातन-धर्मी संस्कृति है जिसमें कोई सामूहिक धर्म-शत्रु नहीं है।इस संस्कृति के कारण यहां निर्बाध वैचारिक स्वतंत्रता और दूसरी मज़हबी असहिष्णुता का भी समावेश जारी रहा,पिछले बारह सौ सालों से।परंतु जिस तरह किसी स्वस्थ -उसी लकड़ी को कोई आग जलाकर राख कर देती है ,जिस पर उसका वजूद कायम है,उसी तरह जिन सेमेटिक धर्मों को भारत की सनातन -संस्कृति ने पनपने का वातावरण प्रदान किया,इन सेमेटिकों नें उसी संस्कृति को खत्म करने की हिंसात्मक कोशिश की ,जिसमें बे सफल भी रहे और जो आज भी जारी है।
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विश्व की कई दुष्ट घटनाओं का प्रति-उत्सर्ष देख कर मन कुछ मानव की अच्छाइयों के प्रति आश्वस्त हुआं।अजरबैजान-आर्मीनियां का संघर्ष रूस की मध्यस्थता....विश्वास होता है कि रूस किसी निश्चित परिणति जो उसके अनुकूल हो,की प्रतीक्षा में था इतनी बरबादी तक ।चीन का संयम उसका इरादा है या विवशता -या बिवशता का इरादा-समझ नहीं आ रहा पर बह एक हेकड़ी से लैस देश है जिसकी अकड़ अमेरिका-भारत की युति ने फीकी कर दी,चीन का उद्देश्य-कि कोरोना-विलेन के अपराध- कटघरे से बाहर आना,की पूर्ति के लिये उसने दुनिया को समेटते हुये तनाव के घेरे पैदा किये।उसे मालूम है कि निश्तित हार और अनिश्चित संहार उसे लगभग नष्ट ही कर देगा।इस्लामिक एजेण्डा अपनी रफ्तार पर है,कुछ भी हो सकता है,और दुर्घटनायें ऐतिहासिक स्पीड पकड़ सकतीं है।
यह किसान जिस धमकी शैली में आंदोलन चला रहे हैं,इन्हे यह खुशफहमी है कि यह नेता जो खुद दोगले और झूंठे हैं,इनको ,अपने आकाओं के लिये कुछ दिलवा पायें गें।यह पूरी तरह निराधार है।कोई भी सरकार किसी भी कीमत पर बिरोधियों का एजेंड़ा सफल नहीं होने देगी,और जब सामान्य जन इस सारी हलचल के खिलाफ हो। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि बीजेपी सरकार के प्रस्तावित हर कानून का बिपक्ष बिरोध कर रहा है,ऐसी स्थिति में सरकार तो और भी इन कानूनों को वापस नहीं लेगी।कुछ राजनीतिक पार्टियों के मुखौटे वदलनें में सहायक होने के अतिरिक्त इस पूरे हंगामें का कोई लाभ नहीं होगा।

bahut he sunger geet
जवाब देंहटाएंmishra je ko sarsati je nay sawaym prasad dia
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